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Tuesday, 11 March 2014

New software can spot lies

अब झूठ बोलने वालों की खैर नहीं। वैज्ञानिकों ने एक ऐसी कृत्रिम खुफिया प्रणाली विकसित की है जो लिखित या मौखिक गवाही के दौरान झूठ को सटीकता से पकड़ लेगी। शोधकर्ताओं के मुताबिक यह सॉफ्टवेयर पुस्तकों की नकली ऑनलाइन समीक्षा की भी पहचान कर लेगा।

ब्रिटेन के कोलचेस्टर में स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ एसेक्स के भाषाविद् मैसिमो पोएसियो और इटली के ट्रेंटो में स्थितसेंटर फॉर माइंड/ब्रेन साइंस के थोमासो फार्नसिएरी ने इस प्रणाली को विकसित किया है। प्रणाली को स्टाइलोमेट्री तकनीक की मदद से विकसित किया गया है जो इस बात की गणना करता है कि कोई खास शब्द किसी पैराग्राफ में कितनी बार आया है। न्यू साइंटिस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक अभी तक उपलब्ध तकनीक से इस बात का पता लगाया जाता है कि किसी खास टुकड़े को किसने लिखा है, लेकिन यह सॉफ्टवेयर पता लगाएगा कि इसमें लिखी गई चीजें सच हैं या झूठ।

सॉफ्टवेयर झूठ को सटीकता से पकड़ लेता है यह सुनिश्चित करने के लिए मैसिमो और थोमासो ने इसमें इटली कीअदालत में दिए गए उन गवाहों के बयानों को फीड किया, जिसके बारे में माना जाता है कि उन्होंने झूठी गवाही दी। शोधकर्ताओं ने कहा कि बचाव पक्ष या गवाह झूठ बोल रहे हैं, सॉफ्टवेयर ने इसके संकेत 75 प्रतिशत बिल्कुल सटीक दिए।

Source: Hindi News

Woman ‘marries’ dog: ‘I couldn’t think of anything more I’d need from a life partner

आम तौर पर शादी के लिए ऐसे हमसफर की तलाश होती है जो आपसे प्यार करे और आपकी परवाह करे। ब्रिटेन में एक तलाकशुदा महिला को यह सारी खूबियां अपनी कुतिया में नजर आईं और उन्होंने उसके साथ शादी रचा डाली। पढ़ने में यह अटपटा लग सकता है, लेकिन यह सच है।

दक्षिण लंदन निवासी 47 वर्षीय अमांडा रोजर्स ने अपनी पालतू कुतिया शेबा के साथ पूरे रीति रिवाज के साथ विवाह किया है। उनका मानना है कि शेबा में वह सभी गुण हैं जो उन्हें अपने जीवनसाथी में चाहिए थे। यह शादी 200 लोगों की मौजूदगी में क्त्रोएशिया के स्पि्लट शहर में अगस्त, 2012 में हुई थी। रोजर्स ने कहा, शेबा मेरी जिंदगी में कई वर्षो से है। वह मुझे हंसाती है और जब मैं दुखी होती हूं तो मुझे दिलासा देती है। अपने ंजीवनसाथी से मुझे इससे ज्यादा और कुछ नहीं चाहिए। रोजर्स की पहली शादी 20 साल पहले हुई थी, लेकिन कुछ महीनों बाद यह रिश्ता टूट गया था। उन्होंने बताया कि मैंने घुटने के बल बैठकर शेबा को शादी का प्रस्ताव दिया और उसने पूंछ हिलाकर अपनी स्वीकृति दी। जब मैं छोटी थी तभी से चाहती थी कि मेरी शादी की पोशाक सबसे सुंदर हो। इसलिए इसे मैंने खुद डिजायन किया। वह मेरी जिंदगी का यादगार दिन था।

Source: Hindi News

Monday, 24 February 2014

Two kids always live in water

झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के डोबरोबासा गांव के दो बच्चे हमेशा पानी में ही रहते हैं। इनकी जिंदगानी पानी है। सोते, उठते, जागते, बस पानी-पानी। लगभग मत्स्य जीवन। पानी से निकाला कि सांसें थमने लगती हैं।

दरअसल, माधो सोय के दोनों बेटे पांच वर्षीय रोहित सोय व तीन वर्षीय मंगल सोय एक्टोडर्मल डिसप्लेसिया बीमारी से पीडि़त हैं। इनके शरीर में पसीने को बाहर निकालने वाली ग्रंथियां नहीं हैं। लिहाजा उनके शरीर का तापमान बहुत ज्यादा रहता है और वे पानी में रहना पसंद करते हैं। पानी से नाता टूटा कि प्राण हलक में आए। फिलहाल दोनों का इलाज रांची स्थित राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (रिम्स) में चल रहा है। अस्पताल ने बच्चों की बीमारी पर अलग से कक्षाएं चलाने और शोध करने का फैसला किया है। रिम्स में इलाज कर रहे शिशु रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. एके शर्मा ने बताया कि दोनों को एक्टोडर्मल डिसप्लेसिया बीमारी है। यह एक आनुवांशिक रोग है व इसका इलाज संभव नहीं है। यही कारण है कि इससे पीडि़त लोग लंबे समय तक जीवित नहीं रहते हैं। पूरे विश्व में इस तरह के मरीजों की संख्या करीब सात हजार है। फिलहाल रिम्स में ही उसका उपचार होगा और उनका स्कीन बायोप्सी के लिए गुरुवार को मुंबई भेजा जाएगा।

बच्चों की मां नागुरी सोय ने बताया कि उनका पहला बेटा रोहित जन्म के बाद हमेशा रोता रहता था। लेकिन शरीर पर पानी की बूंदें पड़ते ही चुप हो जाता था। पहले तो काफी दिनों तक समझ में नहीं आया। लेकिन धीरे-धीरे पता चला कि पानी के बिना रोहित को रहा नहीं जा रहा है। दो साल बाद दूसरे बेटे मंगल का जन्म हुआ। मंगल भी इसी तरह से रोने लगता। इसके बाद दोनों को पानी में रखने का फैसला लिया। इसके बाद से दोनों का स्वास्थ्य दुरुस्त रहने लगा। अब दोनों बच्चे बड़े होने लगे हैं, लेकिन उनके दो-दो दांत ही निकले हैं। दोनों पानी के बिना एक पल भी रह नहीं सकते हैं।

Greed is the root of all evils.

लालच बुरी बला है। इस बात का नमूना यहां एक चोर ने चोरी करने के दौरान पेश किया। हुआ यूं कि 42 वर्षीय यह चोर घर से थोड़ी दूर पर बने बंगले से टीवी चुरा लाया। 

पूरी सतर्कता से इस घटना को अंजाम देने के बाद टीवी को अपने घर में फिट कर देखने लगा। तभी उसे टीवी के साथ रिमोट न होने की कमी खली, जिसे वह जल्दबाजी में वहीं छोड़ आया था। इस समस्या को सुलझाने के लिए थोड़ी देर तक खुद में सोच-विचार किया और वापस जाकर उसी जगह से रिमोट लाना तय किया। 

 लेकिन इस बार दांव उल्टा पड़ गया। वह जैसे ही उस बंगले में रिमोट लेकर भागने लगा, तभी वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने उसे धर लिया। अब महाशय जेल में टीवी के चैनल बदलने के सपने देख रहे हैं।

Robotic termites may one day build houses, not destroy them

हारवर्ड में भारतीय मूल के वैज्ञानिक ने स्वेच्छा से काम करने वाले रोबोट की एक पूरी सेना तैयार कर ली है। ये रोबोट आपसी समायोजन से बिना किसी मानवीय निगरानी के गगनचुंबी इमारतों से लेकर पिरामिड तक बना सकते हैं।

अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि इन्हें ठोस ढांचों को खड़ा करने में सक्षम ये रोबोट सामूहिक बुद्धिमत्ता और समायोजन से कार्य करते हैं। इन्हें किसी निगरानी और दिशा-निर्देश देने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इस प्रणाली को किसी निगरानी और कैमरे से निगरानी की जरूरत नहीं पड़ती है। उनकी सहूलियत के लिए किसी खास किस्म के वातावरण बनाने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है। 

हारवर्ड यूनिवर्सिर्टी के वैानिकों ने ये टर्म्स प्रणाली बनाई है। इसके जरिए रोबोट जटिल और तीन आयामों वाले ढांचों को बिना किसी केंद्रीय कमान या निर्देशित नियमों के बाखूबी बना सकते हैं। टर्म्स प्रणाली की मदद से ऊंची इमारतें, महल, पिरामिड फोम ब्रिक से बनाए जा सकते हैं। इस प्रणाली के जरिए इमारत की सामग्री के जरिए खुद ब खुद ऐसी सीढि़यां बनाई जाती हैं। जिससे गुजरकर ये रोबोट ऊंचे स्थानों तक पहुंचते हैं और उस पर जरूरत के हिसाब से ईंटें जमाते जाते हैं। अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि भविष्य में ऐसे रोबोट बाढ़ आने पर पानी रोकने के लिए बालू की बोरियां लगाने से लेकर मंगल ग्रह पर निर्माण कार्य में भी बखूबी भाग ले सकते हैं।

इस प्रणाली की सबसे अच्छी बात ये है कि जटिल से जटिल कार्य को सामूहिक रूप से ये रोबोट बिना किसी देखरेख के अंजाम दे सकते हैं। ऐसे में जहां इंसान की हदें खत्म होती हैं वहां भी इन रोबोट से बेहतरीन काम लिया जा सकता है। इन रोबोट को काम कराने के लिए माहौल या वातावरण को बदलने की भी जरूरत नहीं है। जैसे बाढ़ में बचाने वालों के भी जीवन का ख्याल रखना होता है। मंगल ग्रह पर इंसान को भेजने के लिए वहां के वातावरण के अनुकूल ही माहौल बनाना होगा। पर इन रोबोट के लिए ये सीमाएं नहीं हैं। इस प्रोजेक्ट की मुख्य जांचकर्ता हारवर्ड में इंजीनियरिंग और कंप्यूटर साइंस की प्रोफेसर राधिका नागपाल और फ्रेड कावली हैं। प्रत्येक रोबोट बिल्डिंग बनाने की इस प्रक्त्रिया में दूसरे रोबोट के समानान्तर काम करता है। 

लेकिन उसे ये नहीं पता होता कि उसी वक्त यही काम और कौन कर रहा है। ऐसे में अगर कोई एक रोबोट टूट गया या काम से हट गया तो इससे दूसरे रोबोट पर असर नहीं पड़ता और वह अपना काम करता रहता है। यानी इस प्रणाली के जरिए एक निर्देश पांच रोबोट या पांच हजार रोबोट को एक साथ दिया जा सकता है। टर्म्स प्रणाली मापने, वितरण प्रणाली और आर्टीफियल इंटेलिजेंस का बेजोड़ नमूना है। नागपाल के इस स्वनियंत्रित प्रणाली अनुसंधान को एलगारिथम के हिसाब से तैयार किया गया है। जिसमें रोबोट का एक समूह एक कालोनी की तरह काम करता है। सभी रोबोट एक समूह में एक इकाई की तरह उच्च स्तरीय काम करते हैं।

Source: Hindi News

Monday, 17 February 2014

Thief fond of photographs


तेजी से बढ़ते स्मार्ट फोन ने कहीं भी किसी जगह किसी की भी तस्वीर उतारने की सहूलियत दे दी है। कुछ लोग तो खुद के फोटो खींचने के बड़े शौकीन होते हैं। इसी शौक के चलते यहां एक शातिर चोर जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गया। 


हुआ यूं कि यहां के एक घर में चोर महाशय चोरी की वारदात को बड़ी ही सफाई के साथ अंजाम देकर चलते बने। वारदात की पड़ताल करने आई पुलिस को मौके से एक मोबाइल मिला। उस फोन से कोई खास क्लू नहीं मिला लेकिन जैसे ही फोटो के फोल्डर को खोला गया, तो पता चला कि फोन का मालिक खुद की फोटो खींचने का बड़ा शौकीन है। उसने अलग-अलग एंगल्स की अपनी कई तस्वीरें खींच रखी हैं। 

बस फिर क्या था, पुलिस ने फोटो वाले व्यक्ति की तलाश शुरू की और महज चंद घंटों की मशक्कत में वह पुलिस के हत्थे भी चढ़ गया। फिर तो पुलिस को जुबान खुलवाने में कितनी देर लगी होगी, यह आप भी समझते हैं। 

Source: Hindi News

9 yr old uk girl finishes 364 books in 7 months

ब्रिटेन में एक नौ साल की पढ़ाकू लड़की ने ऐसा कारनामा कर दिखाया है जिसे जानकर आप चकित हो जाएंगे। वह महज सात महीनों में ही अविश्वसनीय रूप से 364 किताबें पढ़ चुकी है।


डेली एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, चेशायर के एश्ले में रहने वाली फेथ जैक्शन खुद को टेलीविजन कंप्यूटर गेम से दूर रखती है। वह इनकी जगह रोआल्ड दाल्ह या हैरी पॉटर को पढ़ना ज्यादा पसंद करती है। उसे किताबों से बेहद लगाव है। जब वह प्राइमरी स्कूल में थी तब शिक्षकों द्वारा प्रोत्साहित किए जाने पर उसमें कि
ताबों के प्रति प्रेम बढ़ा। फेथ की मां लॉरेन ने कहा कि वह कहती है कि उसे टीवी या कंप्यूटर गेम की तरह ही किताबों को पढ़ने में बेहद मजा आता है। फेथ ने कहा कि उसे सबसे ज्यादा जानवरों या जादू या रोमांच की किताबें पसंद हैं। साथ ही यह भी कहती है कि लेकिन मेरी दुनिया सिर्फ किताबों तक ही सीमित नहीं है। मैं सप्ताह में चार घंटे जिम्नास्टिक करती हूं। इसके अलावा कराटे क्लासेस जाती हूं, नेटबॉल खेलती हूं और ड्रम बजाना सीख रही हूं। 
 
Source: Hindi News

Robotic termites may one day build houses, not destroy them

हारवर्ड में भारतीय मूल के वैज्ञानिक ने स्वेच्छा से काम करने वाले रोबोट की एक पूरी सेना तैयार कर ली है। ये रोबोट आपसी समायोजन से बिना किसी मानवीय निगरानी के गगनचुंबी इमारतों से लेकर पिरामिड तक बना सकते हैं। 

अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि इन्हें ठोस ढांचों को खड़ा करने में सक्षम ये रोबोट सामूहिक बुद्धिमत्ता और समायोजन से कार्य करते हैं। इन्हें किसी निगरानी और दिशा-निर्देश देने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इस प्रणाली को किसी निगरानी और कैमरे से निगरानी की जरूरत नहीं पड़ती है। 

उनकी सहूलियत के लिए किसी खास किस्म के वातावरण बनाने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है। हारवर्ड यूनिवर्सिर्टी के वैानिकों ने ये टर्म्स प्रणाली बनाई है। इसके जरिए रोबोट जटिल और तीन आयामों वाले ढांचों को बिना किसी केंद्रीय कमान या निर्देशित नियमों के बाखूबी बना सकते हैं। टर्म्स प्रणाली की मदद से ऊंची इमारतें, महल, पिरामिड फोम ब्रिक से बनाए जा सकते हैं। इस प्रणाली के जरिए इमारत की सामग्री के जरिए खुद ब खुद ऐसी सीढि़यां बनाई जाती हैं। जिससे गुजरकर ये रोबोट ऊंचे स्थानों तक पहुंचते हैं और उस पर जरूरत के हिसाब से ईंटें जमाते जाते हैं। अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि भविष्य में ऐसे रोबोट बाढ़ आने पर पानी रोकने के लिए बालू की बोरियां लगाने से लेकर मंगल ग्रह पर निर्माण कार्य में भी बखूबी भाग ले सकते हैं। 

इस प्रणाली की सबसे अच्छी बात ये है कि जटिल से जटिल कार्य को सामूहिक रूप से ये रोबोट बिना किसी देखरेख के अंजाम दे सकते हैं। ऐसे में जहां इंसान की हदें खत्म होती हैं वहां भी इन रोबोट से बेहतरीन काम लिया जा सकता है। इन रोबोट को काम कराने के लिए माहौल या वातावरण को बदलने की भी जरूरत नहीं है। जैसे बाढ़ में बचाने वालों के भी जीवन का ख्याल रखना होता है। मंगल ग्रह पर इंसान को भेजने के लिए वहां के वातावरण के अनुकूल ही माहौल बनाना होगा। पर इन रोबोट के लिए ये सीमाएं नहीं हैं। इस प्रोजेक्ट की मुख्य जांचकर्ता हारवर्ड में इंजीनियरिंग और कंप्यूटर साइंस की प्रोफेसर राधिका नागपाल और फ्रेड कावली हैं। प्रत्येक रोबोट बिल्डिंग बनाने की इस प्रक्त्रिया में दूसरे रोबोट के समानान्तर काम करता है। लेकिन उसे ये नहीं पता होता कि उसी वक्त यही काम और कौन कर रहा है। 

ऐसे में अगर कोई एक रोबोट टूट गया या काम से हट गया तो इससे दूसरे रोबोट पर असर नहीं पड़ता और वह अपना काम करता रहता है। यानी इस प्रणाली के जरिए एक निर्देश पांच रोबोट या पांच हजार रोबोट को एक साथ दिया जा सकता है। टर्म्स प्रणाली मापने, वितरण प्रणाली और आर्टीफियल इंटेलिजेंस का बेजोड़ नमूना है। नागपाल के इस स्वनियंत्रित प्रणाली अनुसंधान को एलगारिथम के हिसाब से तैयार किया गया है। जिसमें रोबोट का एक समूह एक कालोनी की तरह काम करता है। सभी रोबोट एक समूह में एक इकाई की तरह उच्च स्तरीय काम करते हैं। 

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Monday, 10 February 2014

lets you video chat with avatars of dead people

वाशिंगटन। दुनिया से चले जाने के बाद अपने प्रियजनों, रिश्तेदारों और दोस्तों से वीडियो चैट कर पाना अब संभव हो सकता है। हाल ही में लांच हुई एक नई वेबसाइट लोगों को एक ऐसी सुविधा प्रदान कर रही है जिसके जरिए किसी मृत व्यक्ति की आभासी छवि तैयार की जा सकती है। 

मेसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी द्वारा तैयार की गई इटर्नीडॉटमी नाम की यह वेबसाइट डिजिटल दुनिया में एक बड़ा कदम है। एमआइटी के उद्यमिता विकास कार्यक्त्रम के तहत कुछ इंजीनियरों, डिजाइनरों और कारोबारियों द्वारा इसे मिलकर तैयार किया गया है। इस टीम ने दावा किया है इस वेबसाइट के जरिये किसी व्यक्ति को उसकी मौत के बाद आभासी दुनिया में जिंदा रखा जा सकता है। 

सीएनईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति मरने के बाद अपने परिजनों से संपर्क में रहना चाहता है तो पहले उसे इस वेबसाइट पर अपना रजिस्ट्रेशन कराना होगा। इसके बाद अपनी चैट हिस्ट्री , सोशल नेटवर्किग की जानकारी, फोटो और ईमेल आदि की जानकारी दी जाती है। इनके इस्तेमाल से उस व्यक्ति की यादों, शैली और व्यवहार को नए सिरे से संगठित कर आभासी छवि तैयार की जाती है। 

वेबसाइट के मुताबिक, जानकारियों के इस्तेमाल से तैयार वर्चुअल छवि आपके व्यक्तित्व से काफी हद तक मेल खाने वाली होगी। यह आपके दुनिया से चले जाने के बाद आपके करीबियों, रिश्तेदारों, दोस्तों से बातचीत कर सकेगी, उन्हें सलाह दे सकेगी। यह अपने अतीत से नए सिरे से बातचीत करने जैसा अनुभव होगा। 24 घंटे के भीतर इस वेबसाइट को 36 हजार लोग देख चुके हैं और 1300 से अधिक अपना रजिस्ट्रेशन करा चुके हैं।

अंतरिक्ष में जापानी रोबोट बोला, मुझे कोई दिक्कत नहीं इससे पहले वैज्ञानिक सैकेंड लाइफ नाम से एक पूरी आभासी दुनिया का निर्माण कर चुके हैं। 23 जून, 2003 को लिंडेन लैब कंपनी द्वारा साइबर में एक आभासी दुनिया सृजित की गई। जहां आप उसी तरह आभासी जीवन जी सकते हैं, जैसे पृथ्वी पर। हजारों लोग यहां अपना रजिस्ट्रेशन करा चुके हैं। 

Source: Hindi News

Tuesday, 28 January 2014

American Woman Becomes Indian Housewife

अमेरिका में रिसेप्शनिस्ट का कार्य करने वाली 41 वर्षीय अमेरिकी महिला एड्रियाना पैरल का अपने से 16 वर्ष छोटे भारतीय युवक से फेसबुक पर रोमांस ऐसा रंग लाया की वह कुछ महीनों में ही भारत आ पहुंची और हरियाणा निवासी मुकेश कुमार के साथ विवाह के पवित्र बंधन में बंध गयी। 

बचपन से अमेरिकन लाइफस्टाइल में रहने वाली यह महिला सब कुछ छोड़ भारत के एक छोटे से गांव में अपने पति मुकेश के साथ सुखी वैवाहिक जीवन का आनंद ले रही हैं। 

एड्रियाना एक ग्रामीण गृहिणी की तरह मुकेश के घर के सभी कार्यो को कर रही है जैसे घर की सफाई, खाना बनाना और फार्म हाउस की देखरेख आदि। 

एड्रियाना अमेरिका में अपनी 25 वर्षीय एक बेटी को भी छोड़कर आयी है। एड्रियाना का कहना है कि वह मुकेश के साथ अपने अपने वैवाहिक जीवन से बहुत खुश है और किसी भी कीमत पर इसे नही छोड़ सकती। 

लेकिन एड्रियाना का परिवार उसके इस कदम से सदमे में है। एड्रियाना ने बताया कि कुछ लोग समझते थे कि मुकेश कोई झूठा आदमी होगा जो बस मेरे साथ फेसबुक पर टाइम पास करता है लेकिन जब मैं इंडिया पहुंची तो इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर मुकेश को देखकर मुझे बहुत राहत मिली। 

एड्रियाना का नया घर हरियाणा के पोपरन गांव का एक मामूली सा फार्म हाउस है। शहर से इस गांव से पहुंचने में गाड़ी से 30 मिनट का समय लगता है। एड्रियाना ने बताया की जब वह हवाई जहाज से उतरी तो यहां का संस्कृति देख सदमे में थी। उसने देखा की महिलायें घरों में रहती हैं। पहली बार मुझे लगा की यह वास्तविक संघर्ष है लेकिन जल्द ही मैंने यह भी महसूस किया कि सुखी जीवन के लिए जरूरी नही की सारी सुख सुविधायें हों। एड्रियाना कहती हैं कि गरीब स्थानीय लोगों में मेरी गिनती होना मेरे लिए काफी बड़ी चुनौती थी। 

एड्रियाना अब भारतीय रहन-सहन और भारतीय पहनावा ही पहनती है, वो कहती है कि यहां गांव में विदेशी लोग नहीं दिखते हैं इसलिए में जब भी कहीं जाती हूं तो मुझे देखने वालों की भीड़ लग जाती है। मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं कोई सेलीब्रिटी हूं लेकिन अब मुझे इसकी आदत पड़ चुकी है। 

मुकेश अब एड्रियाना से अंग्रेजी भाषा सीख रहा है उसने टूटी फूटी अंग्रेजी में कहा एड्रियाना इज ए गुड वाइफ। वह घर के सभी कार्य करती है और जब मां मेरे लिए खाना बनाती है तो उनसे कहती है यह मैं करूंगी यह मेरा काम है। मैं अपने सच्चे प्यार को पाकर बहुत खुश हूं। 

यह विवाहित जोड़ा आगे अपना परिवार भी बढ़ाना चाहता है। एड्रियाना कहती हैं कि अगर यहां भी अमेरिका जैसा खाना और सुख-सुविधाये मिल जाये तो बहुत अच्छा हो। वो अपने परिवार के साथ एक बार अमेरिका जाने की इच्छा भी रखती है। एड्रियाना कहती है कि मुझे भारत के लोग बहुत अच्छे लगे मुझे यह अपना दूसरा घर लगता है। 

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Indian-origin engineer creates 3D printer that makes pizzas fit for astronauts

वाशिंगटन। भारतीय मूल एक इंजीनियर ने एक ऐसा थ्रीडी प्रिंटर विकसित करने का दावा किया है, जो लंबे अभियानों के दौरान अंतरिक्षयात्रियों के लिए लजीज भोजन और पिज्जा तैयार कर सकेगा। मैकेनिकल इंजीनियर अनजान कांटेक्टर ने अपने इस प्रोजेक्ट के लिए अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा से 125000 डॉलर (करीब 78 लाख रुपये) का अनुदान हासिल किया था। इसके तहत अनजान को ऐसे थ्रीडी प्रिंटर का प्रोटोटाइप तैयार करना था जो अंतरिक्षयाक्षियों को अधिक पोषक भोजन का विकल्प प्रदान कर सके। अब तक अंतरिक्षयात्री अभियान के दौरान डिब्बाबंद और सूखे मेवे व अन्य खाद्य पदार्थ ही खाते हैं। टेक्सास स्थित सिस्टम्स एंड मटीरियल्स रिसर्च कारपोरेशन में काम कर रहे अनजान ने कहा कि यह प्रिंटर खाद्य पदार्थ में मौजूद प्रोटीन, वसा व अन्य पोषक तत्वों को बरकरार रखेगा। प्रिंटर प्रक्त्रिया पूरी करने के बाद महज 70 सेकेंड में पिज्जा तैयार कर देगा। 

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Tuesday, 21 January 2014

World s smelliest man: Iranian defeats Indian

 
विचित्र व्यक्ति की पहचान उसकी उसके रहन-सहन और कार्यशैली पर निर्भर करता है। आज तक आपने बहुत विचित्र प्राणी के बारे में सुना और देखा होगा पर आज हम आपको एक ऐसे शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसको दुनिया का सबसे गंदा प्राणी घोषित किया गया है। जी हां गंदा व्यक्ति, दक्षिणी ईरान के डेजगाह शहर के दूरदराज इलाके में रहने वाला एमऊ हाजी। 
 
पानी से दूर रहने वाले एमऊ पिछले साठ वषरें से नहाया नहीं है। सड़े मांसों का सेवन करने वाला 80 वर्षीय एमऊ के बारे में बताया जाता है कि एमऊ ने पानी से दूर रहने का निर्णय गुरू कैलाश सिंह से प्रेरणा लेकर लिया था। भारत के वाराणसी शहर में रहने वाले 69 वर्षीय कैलाश सिंह ने वर्ष 1974 के बाद अपने शरीर पर पानी की एक बूंद भी नहीं पड़ने दी। एमऊ की पत्नी बताती हैं कि एमऊ रोजाना जंक तेल से निकलने वाला पांच लीटर गंदा पानी पी जाता है। साथ ही एमऊ की पत्नी ने कहा कि अब उसके साथ सोने से भी मुझे नफरत है। आपको बता दें कि एमऊ अपने बालों को काटने के बाद उसे जला कर उसकी राख को हेलमेट में रखकर उसे पहन लेता है, ताकि गर्मी बरकरार रहे। बताया जाता हैं कि एमऊ के साथ हुए पहले हुए किसी हादसे के कारण उसके दिमाग पर गहरा प्रभाव पड़ा और उसके बाद से उसने ऐसी हरकतें करनी शुरू कर दी। 

Source: Hindi News